ये कविता है तो मारीना त्स्वेतायेवा की... लेकिन कई बार हमारे अनुभव के आकाश में चमकता हुआ चांद हमसे बताता है... कि नंदिनी, किसी युग में तुम पेरिस में रहती थी... और अपने दिल में आई चीजों को किसी और भाषा में कहती थी... बचपने की बात लगेगी... पर सच कहूं, हमको ऐसा लगता है कई बार... के हम ही थे पिछले जन्म की मारीना त्स्वेतायेवा... और उनके नाम से हमने ही लिखी थी ये कविता... कुछ लोगों का लिखा कितने भीतर तक गहराई में अंतस में बस जाता है... कि उसका स्वंय से एकाकार हो जाता है... लीजिए... हम तो समीक्षक भी हो गए... लगे समीक्षा करने... गलदअश्रु... अभी तो अपने बचपने से ही निपटना है... तब तक आप ये कविता पढिये... मारीना की है अर्थात मेरी है... मेरी है अर्थात मारीना की है... अगली बार हम अपनी कविता डालेंगे गौरव जी.... वादा है... और प्यार की फिलासफी में क्यों जाना... जो प्यार करते हैं वो फिलासफी नहीं करते... जो फिलासफी करते हैं कभी प्यार नहीं कर पाते... मैंने तो जीवन में प्यार चुना है... च्वाइस तो हर किसी के सामने है... गौरव जी, नाराज मत होना... हमारे कमेंट से बहुतै लोग नाराज हैं... अब हम ये तो लिख दिए ईमानदारी से... पर कुछ लोग ये टिप्पणी करने आएंगे ..कि काहें चोंहचिया रही हो... इस जनम में भी मारीना ही हो... वैसे अभी आपके बड़े सवाल का जवाब नहीं सूझा... तो सलीम-जावेद स्टाइल में प्यार की फिलासफी वाला डायलाग चेंप दिया... पढिए हमारी एक और पसंदीदा कविता... जो मारीना के बारे और जानना चाहते हैं वो
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काश मैं तुम्हारे साथ होतीकाश मैं तुम्हारे साथ रहती
एक छोटे से कस्बे में
जहां होती गोधूलि में डूबी शामें
और गूंजती शाश्वत घंटियों की टन टन
और एक छोटी सी गंवई सराय में
ऊंची आवाज से गूंजते घण्टे
किसी पुरानी घड़ी के
समय की बूंदों की तरह टप टप
और कभी किसी शाम किसी दुमंजिले पर
बज उठती बांसुरी
और वादक स्वंय बैठा होता खिड़की में
और खिड़की के छज्जे से झांकते बड़े बड़े ट्यूलिप
कमरे के बीचोबीच एक बड़ी अंगीठी होती
जिसके हर पत्थर पर एक डिजाइन बना होता
एक गुलाब एक दिल एक जहाज
और एकमात्र खिड़की से झांकती
बर्फ बर्फ बर्फ
तुम उसी मुद्रा में लेटे हुए होते जिसे मैं प्यार करती हूं : अलसाये
खोये खोये और लापरवाह
और बस कभी कभी गूंज जाती तीखी
माचिस की रगड़
सिगरेट जलती और छोटी होती जाती
और काफी देर बाद उसके सिरे पर कांपती
राख- - - छोटा सा मटमैला स्तंभ
तुम इतने आलसी हो कि उसे झाड़ते भी नहीं- - -
और सारी सिगरेट उछालकर फेंक देते आग में