Saturday, May 24, 2008

जिंदगी एक रेलवे स्‍टेशन है, जल्‍दी ही चली जाऊंगी... कहां, यह नहीं बताऊंगी

मारीना त्‍स्‍वेतायेवा मेरी पसंदीदा कवयित्री हैं... विदेशी साहित्‍य मैंने कम पढ़ा है और जो भी पढ़ा है... हिंदी में पढ़ा है... शब्‍द तो शब्‍द हैं... उनमें क्‍या स्‍वदेशी क्‍या विदेशी... मनुष्‍य के भीतर के भाव तो वही होते हैं... प्रेम और दर्द का अनुवाद ‍किसी भी भाषा में कर लो... प्रेम और दर्द ही रहेंगे... मारीना का जीवन एक स्‍त्री का जीवन लगा मुझे हमेशा... हमारी एक परंपरागत स्‍त्री... जिसने प्रेम में धोखा पाया... जिसने अनमने ढंग से देह को दिया... दी जाती हूं मैं... संगीत, प्रकृति और एकांत प्रिय... और स्‍वामित्‍व बोध- बच्‍चों कॉपियों और स्‍मृतियों तक सीमित... बहुत कम होता है एक स्‍त्री के जीवन में स्‍वामित्‍व बोध के लिए... कम उम्र में दुनिया छोड़ जाने वाली यह कवि आज भी कविता लिखती हर स्‍त्री के दिल के बीच धड़कती रहती है... भरी जवानी में बुढ़ापे का अहसास करने वाली इस कवि ने हमेशा कहा... 'जिंदगी एक रेलवे स्‍टेशन है, जल्‍दी ही चली जाऊंगी... कहां यह नहीं बताऊंगी... मेरे जाने के बाद मुझे खोजोगे और और तुम्‍हारी रातें नींद से ज्‍यादा लंबी हो जाएंगी...' यह एक कविता प्रस्‍तुत है...

मैं लिखती रही

मैं लिखती रही स्‍लेट पर
लिखती रही पंखों पर
समुद्र और नदी की रेत पर
बर्फ पर कांच पर

लिखती रही सौ-सौ बरस पुराने डण्‍ठलों पर
सारी दुनिया को बताने के लिए
कि तू मुझे प्रिय है, प्रिय है, प्रिय है
लिख डाला इंद्रधनुष से पूरे आकाश पर

कितनी इच्‍छा थी मेरी कि हर कोई
सदियों तक खिलता रहे मेरे साथ
फिर मेज पर सिर टिकाए
एक के बाद एक
काटती रही
सबके सब नाम

पर तू जो बंध गया है बिके हुए के हाथ
क्‍यों डंक मारता है मेरे हृदय में
जिसे मैंने बेचा नहीं वह अंगूठी
आज भी रखी है मेज पर .

16 comments:

मीत said...

क्या बात है. बहुत बढ़िया.
और ये तो बस कमाल है "
"मेरे जाने के बाद मुझे खोजोगे और और तुम्‍हारी रातें नींद से ज्‍यादा लंबी हो जाएंगी..."

Udan Tashtari said...

'जिंदगी एक रेलवे स्‍टेशन है, जल्‍दी ही चली जाऊंगी... कहां यह नहीं बताऊंगी

--हाय, यह अत्याचार!! किस बात की सजा है?


गजब रचना है, बधाई.

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

मारीना त्स्वेतायेवा की कविता यहां प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद ।

सुशील कुमार said...

सुन्दर प्यारी कविता लिखने वाले और प्रस्तुत करने वाले को धन्यवाद।

Neelima said...

बहुत-बहुत बधाई और स्वागत !

ravindra said...

मैं जब भी स्वेतायेवा की कविताएं पढ़ता हूं एक गहरे अवसाद से भर जाता हूं। यह कविता कितने गहरे अवसाद में लिखी गई होगी इसकी कल्पना करना भी मेरे लिए मुश्किल है। आपको इसलिए धन्यवाद कि आपने उनकी इस कविता को चुना...
रवींद्र व्यास

Sanjeet Tripathi said...

शुक्रिया

शायदा said...

बहुत अच्‍छी कविता लेकर आईं तुम, धन्‍यवाद। एक बात कहना चाहूंगी जो शायद मारीना से लेकर मीना कुमारी और एक आम औरत तक कॉमन है, वह है उसकी सोच-मेरे जाने के बाद मुझे खोजोगे और और तुम्‍हारी रातें नींद से ज्‍यादा लंबी हो जाएंगी., सच शायद इससे कहीं अलग होता है।

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

लिख डाला इंद्रधनुष से पूरे आकाश पर
अपने आप में बहुत सारे एहसास समेटे हुए है ये पंक्ति

DR.ANURAG ARYA said...

शीर्षक देख कर खीचा चला आया पहले कभी ये कविता नही पढी थी ......अपने आप मे पूर्ण कविता है......

Manish said...

मारीना त्‍स्‍वेतायेवा के बारे में थोड़ा और तफ़सील से बतातीं तो हमारे जैसे अज्ञानियों का भला हो जाता।

वैसे उनके जिस अनुवादित अंश को आपने यहाँ प्रस्तुत किया है वो बेहतरीन लगा।

संदीप said...

मैने चार-पांच साल पहले एक कविता पढ़ी थी, जिसमें गोधूली बेला में एक कमरे में बैठे प्रेमी प्रेमिका और धीमी गति से फिसलते शाम के धुंधलके और प्रेमी के बारे में कुछ लिखा था, ठीक से याद नहीं लेकिन मुझे वह कविता कुछ अच्‍छी लगी थी, शायद मारीना की ही थी, जानकारी हो तो बताइएगा

khabaree said...

sundar ati sunder

गौरव सोलंकी said...

स्त्री की कविता में एक अलग तरह का प्रेम दिखता है, जिसमें पुरुष की तरह जुनून नहीं होता, समर्पण होता है, समझदारी होती है...और अधिकांशत: ऐसा जैसे स्वयं को बिना प्रश्न पूछे सौंप दिया हो।
कविता नि:संदेह अच्छी है, लेकिन जैसा शायदा जी ने कहा, मैं भी मानता हूं कि यही हर औरत में कॉमन है। ...लेकिन यही क्यों हर औरत में कॉमन है, प्यार किसी के हाथों, भावनाओं में जकड़े रहने की तरह क्यों? पागलपन की तरह क्यों नहीं? और पागलपन भी है तो वह खुल के नहीं है।
यहाँ स्त्री की आज़ादी पर बात करना मेरा मक़सद नहीं। शायद आप समझें।
हाँ, आप अपनी कविताएं भी पढ़वाइए।

शैलेश भारतवासी said...

गौरव सोलंकी के ब्लॉग 'मेरा सामान' के माध्यम से आप तक पहुँचा, महान कविताओं को आमलोगों तक पहुँचाने का आपका कार्य पसंद आया। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे बहुत बढ़िया होने वाला है हिन्दी ब्लॉग जगत में।

स्वागत!

DR. VIKAS said...

tum likh rahi rahi thi sou baras purane dhanthalo par, tum likh rahi thi indra dhunashi asman par, par nahi likha tumne uski dhadkno par, tum bhul gayi likhna uski sanso par, jo kar raha tha intjar tumhara baraso se, ki tum aaoge or kahoge ki tum mere priy ho. Phir le chaloge ape sath dikhne us indhanushi akash ko, un nadi ke sunsan kinaro ko, aam ke bago ko, or apne dil ko, JANAN LIKHA THA USKA PRIY KA NAM. WO KARTA RAHA RAHA TUMHARA ANAT INTJAR............................