Monday, May 26, 2008

पिछले जनम में हम मारीना त्‍स्‍वेतायेवा थे

ये कविता है तो मारीना त्‍स्‍वेतायेवा की... लेकिन कई बार हमारे अनुभव के आकाश में चमकता हुआ चांद हमसे बताता है... कि नंदिनी, किसी युग में तुम पेरिस में रहती थी... और अपने दिल में आई चीजों को किसी और भाषा में कहती थी... बचपने की बात लगेगी... पर सच कहूं, हमको ऐसा लगता है कई बार... के हम ही थे पिछले जन्‍म की मारीना त्‍स्‍वेतायेवा... और उनके नाम से हमने ही लिखी थी ये कविता... कुछ लोगों का लिखा कितने भीतर तक गहराई में अंतस में बस जाता है... कि उसका स्‍वंय से एकाकार हो जाता है... लीजिए... हम तो समीक्षक भी हो गए... लगे समीक्षा करने... गलदअश्रु... अभी तो अपने बचपने से ही निपटना है... तब तक आप ये कविता पढिये... मारीना की है अर्थात मेरी है... मेरी है अर्थात मारीना की है... अगली बार हम अपनी कविता डालेंगे गौरव जी.... वादा है... और प्‍यार की फिलासफी में क्‍यों जाना... जो प्‍यार करते हैं वो फिलासफी नहीं करते... जो फिलासफी करते हैं कभी प्‍यार नहीं कर पाते... मैंने तो जीवन में प्‍यार चुना है... च्‍वाइस तो हर किसी के सामने है... गौरव जी, नाराज मत होना... हमारे कमेंट से बहुतै लोग नाराज हैं... अब हम ये तो लिख दिए ईमानदारी से... पर कुछ लोग ये टिप्‍पणी करने आएंगे ..कि काहें चोंहचिया रही हो... इस जनम में भी मारीना ही हो... वैसे अभी आपके बड़े सवाल का जवाब नहीं सूझा... तो सलीम-जावेद स्‍टाइल में प्‍यार की फिलासफी वाला डायलाग चेंप दिया... पढिए हमारी एक और पसंदीदा कविता... जो मारीना के बारे और जानना चाहते हैं वो यहां पढ़ें

काश मैं तुम्‍हारे साथ होती

काश मैं तुम्‍हारे साथ रहती
एक छोटे से कस्‍बे में
जहां होती गोधूलि में डूबी शामें
और गूंजती शाश्‍वत घंटियों की टन टन
और एक छोटी सी गंवई सराय में
ऊंची आवाज से गूंजते घण्‍टे
किसी पुरानी घड़ी के
समय की बूंदों की तरह टप टप
और कभी किसी शाम किसी दुमंजिले पर
बज उठती बांसुरी
और वादक स्‍वंय बैठा होता खिड़की में
और खिड़की के छज्‍जे से झांकते बड़े बड़े ट्यूलिप

कमरे के बीचोबीच एक बड़ी अंगीठी होती
जिसके हर पत्‍थर पर एक डिजाइन बना होता
एक गुलाब एक दिल एक जहाज
और एकमात्र खिड़की से झांकती
बर्फ बर्फ बर्फ

तुम उसी मुद्रा में लेटे हुए होते जिसे मैं प्‍यार करती हूं : अलसाये
खोये खोये और लापरवाह
और बस कभी कभी गूंज जाती तीखी
माचिस की रगड़
सिगरेट जलती और छोटी होती जाती
और काफी देर बाद उसके सिरे पर कांपती
राख- - - छोटा सा मटमैला स्‍तंभ
तुम इतने आलसी हो कि उसे झाड़ते भी नहीं- - -
और सारी सिगरेट उछालकर फेंक देते आग में

11 comments:

अनूप शुक्ल said...

चोंहचिया रही हो वाह! मजेदार!

Udan Tashtari said...

रोचक! लिखती रहो.

Pramod Singh said...

आया. देखा. हटा. सोचा कोई फिलॉसिफ़ल कमेंट करूं, फिर सहमकर ठहर गया कि कहीं ऐसा न हो प्रेमांटि (एंटी प्रेम) समझा जाऊं, तो एक विसेंआहू (विदाउट सेंस ऑव ह्यूमर) छोड़ के निकल रहा हूं..

सुशील कुमार said...

वाह क्या बात है।

राज यादव said...

उम्दा!!! ...अच्छा लगा आप को पढना.मैंने भी प्रमोद भाई की तरह सोचा कोई फिलॉसिफ़ल कमेंट करू.....awesome creation.

DR.ANURAG ARYA said...

माचिस की रगड़
सिगरेट जलती और छोटी होती जाती
और काफी देर बाद उसके सिरे पर कांपती
राख- - - छोटा सा मटमैला स्‍तंभ
तुम इतने आलसी हो कि उसे झाड़ते भी नहीं- - -
और सारी सिगरेट उछालकर फेंक देते आग में

वाह रूस की इस कवियत्री से आपने हमारा परिचय करवाया .एक ओर महिला शायर है परवीन शाकिर पाकिस्तान की है वो भी ऐसा ही बिंदास लिखती है ....ओर शुरूआती दौर मे अमृता प्रीतम ने भी कुछ ऐसा ही लिखा था.....

संदीप said...

धन्‍यवाद, इस कविता को काफी समय बाद पढ़ा...

गौरव सोलंकी said...

तुम उसी मुद्रा में लेटे हुए होते जिसे मैं प्‍यार करती हूं : अलसाये
खोये खोये और लापरवाह
और बस कभी कभी गूंज जाती तीखी
माचिस की रगड़
सिगरेट जलती और छोटी होती जाती
और काफी देर बाद उसके सिरे पर कांपती
राख- - - छोटा सा मटमैला स्‍तंभ
तुम इतने आलसी हो कि उसे झाड़ते भी नहीं- - -
और सारी सिगरेट उछालकर फेंक देते आग में

इसे पढ़के तो मुझे भी पिछले जन्म में अपने मारीना होने का भ्रम होने लगा है।
शिव कुमार बटालवी को पढ़के हमेशा ऐसा ही लगता है मुझे...जैसे अपने आप को पढ़ रहा हूं।
फ़िलॉसफी वाला डायलॉग अच्छा था चाहे सलीम जावेद टाइप ही था। :)
आपकी कविता की प्रतीक्षा है। वैसे इतनी अच्छी कविताएं पोस्ट करके आपने अपने लिए बढ़ी हुई अपेक्षाओं का संकट भी खड़ा कर लिया है। ;)
मगर कोई बात नहीं, ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना। आप बढ़िया ही लिखती हैं, ऐसा हमें लग रहा है।
बड़े सवाल का जवाब सोचिए। चुना तो हमने भी आप वाला रास्ता ही है, मगर जवाब भी खोज लिया जाए तो बरसों की जिज्ञासा शांत हो जाएगी।

बाल किशन said...

वाह. वाह. वाह. वाह.
अति सुंदर.
सुन्दरतम
आभार.
पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ. लिखने का स्टायल भी बहुत उम्दा है.
इतनी अच्छी कविता है और शुक्ल जी ये क्या कह रहे है?

Anonymous said...

svaagat hai meri priya kavi marina tsvetaeva ka punarjanm leni vaali nandni ji! Ye anuvaad aapne kiye hain kya? yadi nahin to anuvaadak kaa naam bhi denaa chaahiye.
haardik mangalkaamnayeen.

Rajesh said...

In the morning, read about you in Dainik Bhaskar Newspaper and after visiting the site and reading ur poems, Site par aana sarthak laga or such main bahut majaa aaya. Hallanki i am on ordinary person and very little know about Poems but bahut mazaa aaya.